2008-07-26

हम जीने की हमेशा तैयारी करते है जीते नही ...


जिंदगी में हमारी सबसे बड़ी ग्लानि हमारे द्वारा किये ग़लत काम नही अपितु वे सही काम होते है जो हमने नही किये
- आज सुबह ९.१५ मिनट पर मेरी दोस्त डॉ प्रिया का एस .एम्.एस

कैंसर diagnose होने से तीन महीने पहले का चित्र 

स्ते वैसे ही है बस आस पास ऊँची इमारतों ने सूरज का रास्ता रोक लिया है ... ऐसा लगता है ये शहर अब आसमान से बातें करता है..५ साल बाद उस शहर में आया हूँ जो अब भी मेरी रगों में दौड़ता है पर पाँच साल इस शहर को जैसे अपने साथ आगे ले गये है ..मै ओर जाट अपार्टमेन्ट में गाड़ी पार्क करते है ..दसवे फ्लोर पर घर है ,लिफ्ट तक जाते जाते जाट का मोबाइल बज गया है जिग्नेश का फोन है ...आधे घंटे में पहुँच रहा है.....खाना घर पे खाना है ...वो कहता है ..घंटी बजते ही अंकल दरवाजा खोलते है ..पैर छूने झुकता हूँ तो सीधे गले लगा लेते है .....कुछ सेकेंड तक गले लगा कर रखते है....."अरे आंटी आप तो जरा भी बूढी नही हुई "मै आंटी से पैर छूते हुए कहता हूँ तो वे मुस्कराती है....सोफे पर बैठा हूँ तो दीवार पर नजर जाती है...सामने कृपा की तस्वीर है.....मुस्कराती हुई....

मूमन कम बोलने वाली वो लड़की हमेशा आगे बैठी नोट्स लिखती मिलती या एनाटोमी dissection हॉल में किसी को कुछ समझाती .... ओर छोटी छोटी बातो को खुश होकर बताती ..हमारे ग्रुप में सबसे सीधी ..मेरे गुजराती उच्चारण को .हमेशा ठीक करने की कोशिश करती ओर जाट की हरियाणवी पर अक्सर उलझती ,उसके मासूम से सपनो में से एक सपना अक्सर रहता ....नयूरोलोजिस्ट बनने का जिंदगी मगर कई तह में है धीरे धीरे खुलती है

दो भाई बहनों में बड़ी ,माँ की लाडली ,माँ की आँखों से सारे सपने जैसे उसकी उसकी आँखों में सिमट आते ..छोटी छोटी खुशियों को सहेजती ओर घडा भरती ....मुझे याद है . कॉलेज के function मे DEBATE पर बोलते बोलते वो पहली बार जब ब्लेक आउट हुई थी हमने इसे नर्वस नेस समझ मामूली घटना की तरह नजर अंदाज किया था .,कुछ दिनों बाद उसने जब अपने कंधे मे दर्द की बात की तो हम सभी ने इसे भी हँसी-मजाक मे टाल दिया ......फ़िर सी .टी स्केन...फ़िर biopsy......कागज का एक टुकडा ..
Ewings sarcoma “of scapula १ लाख लोगो मे १ व्यक्ति को होने वाला कैंसर .....पूरा परिवार थम गया ...२० साल की वो लड़की ...रातो रात बदल गयी ....जसलोक हॉस्पिटल जाने से पहले मिली ..कही कोई घबराहट नही ,शांत खामोश ...बस इतना कहा "एक चक्कर लगाना पड़ेगा ब्लड ग्रुप ओ वालो को....मैंने सर हिलाया

बॉम्बे जसलोक हॉस्पिटल .,AMPUTATION ..(..पूरा हाथ काटना) एक आप्शन रखा गया ......पिता जैसे टूट गये थे .माँ खड़ी रही चट्टान की तरह अपनी बेटी के साथ .....कभी पलक गीली नही देखी मैंने ..पिता कई बार फूट पड़ते ....माँ ने ढेरो डॉ से बातें की कभी टाटा ,कभी अहमदाबाद ..ढेरो डॉ से मुलाकाते ...,ढेरो किताबे पढ़ी ...क्या बिना हाथ काटे ऑपरेशन हो सकता है ?हाँ इंग्लेंड के एक डॉ ने कहा ...जसलोक हॉस्पिटल में ऑपरेशन हुआ ...महीनो अस्पताल में रेंगते से गुजरे ...वापस आयी....


chemotherepy के दौरान लिया गया फोटो ( ४ बेस्ट फ्रेंड) 

 chemotherepy का दौर ओर उसके साइड एफ्फेक्ट्स....... पर वो जीवट थी ..विग पहनकर कॉलेज आती अब भी आगे बैठती ,कभी इस मुद्दे पर कोई बात नही ,जब हमारा ग्रुप कैंटीन में खामोश बैठता जाट को छेड़ती"क्यों तुम्हारे हरियाणवी चुटकले ख़त्म हो गये ?जिस दिन उसकी chemothrepy की लास्ट डोज़ हुई ,उसके एक हफ्ते बाद हम सब मिलकर लॉन्ग ड्राइव पर समंदर पे गये ....वहां समंदर के किनारे खड़े होकर उसने फ़िर कहा "देखा मै neurologist बनकर रहूंगी ".......
ऐसा प्रतीत हुआ जैसे गम के साये धीरे धीरे धुंधले पढ़ रहे है ,हम सभी दोस्त फ़िर अपनी अपनी जिंदगी मे मुड़ने लगे ..... लापरवहिया फ़िर सर उठाने लगी ...सपने दुबारा उठ कर खड़े होने लगे ...एक रूटीन सी टी स्केन .....कैंसर शरीर में फ़ैल गया था ....मेटास्टेसिस ..... उस उम्र मे जब जिंदगी दुबारा अच्छी लगने लगे सपने रोज आपके बिस्तर के सिरहाने पड़े मिले ,एक कागज का टुकडा फ़िर आपको इत्तिला दे की आपके सपनो की मियाद इतनी ही थी ....सच जानिये बड़ी बड़ी बाते किताबो मे पढ़ना ,ओर दूसरो को दिलासा देना बेहद आसान है पर ख़ुद उन रास्तों पर गुजरना बेहद मुश्किल....

उसके बाद मुश्किलों के दिन गुजरे ,....याददाश्त खो देना ,कभी हॉस्पिटल ,कभी आई सी यू के चक्कर ,हर रात एक कशमकश ,हर रात उधार की साँसे ......एक साधारहण इन्सान अपनी हठ ओर लगन से कब जिंदगी को इबारत में बदल लेने की ठान ले …कौन जाने ! कही पढ़ी हुई ऐसी बातें जब सामने से गुजरे तो ?
माँ बेटी के सिरहाने रहती ...बिना गीली पलक लिये,उस दौरान भी उन्हें किसी से कोई शिकायत नही रहती ,कभी भगवान् को नही कोसा ,कभी लोगो पर नही झुंझलाई ,कभी हालात ओर मुक्कद्दर जैसे शब्द सामने नही आये .. जिंदगी से रोज उसी शिद्दत से जूझना ओर पल पल के लिये लड़ना ,कहते है औरत अपने अधूरे सपने बेटी की आँखों में डाल देती है उन्हें उतने ही जतन ओर प्यार से सहेजती है ,पर टूटे सपनो को रोज सिलेवार लगाना उन्हें जोड़ने की जद्दोजहद मेरी जबान में उसे हिम्मत नही कहते ,हिम्मत से बड़ी ,उससे जुदा कोई चीज़ है .अपने किसी को तकलीफ मे देखना जितना दुखद है उससे भी कही ज्यादा मुश्किल है इस बात का अहसास की आप उसके लिए कुछ नही कर सकते .....फ़िर
एक रोज जिंदगी हार गयी....पहली बार वे टूट कर बिखरी ....दो सालो का सारा दर्द जैसे कही रुका हुआ था ...बस एक ही सवाल वो हमसे पूछती 'अगर मैंने AMPUTATION करवाया होता तो क्या मेरी बच्ची बच जाती ?

खाना खायोगे ?उनका ये सवाल मुझे वापस खींच लाता है ....भूख नही है ....पर हम दोनों मना नही कर पाते ...जानते है की खाना कही ओर भी बना है... पर उस आवाज में कुछ ऐसा है जिसे हम ना- उम्मीद नही कर सकते उनके चेहरे पे एक खुशी है पूरी परोसते वक़्त....इसलिए दो पूरी ओर ले लेता हूँ...दरवाजे की घंटी बजती है ,जिग्नेश है खाना देखकर गुस्सा होता है फ़िर ना जाने क्यों साथ बैठकर खाने लगता है दोनों अमेरिका जाने वाले है अगले महीने ..अपने बेटे के पास ,कुछ देर उसी की बातें चलती है
चलते वक़्त तस्वीर पर नजर जाती है....कृपा मुस्करा रही है.,अंकल का गला रुंध जाता है गले लगाकर कहते है ‘आते रहा करो ,अच्छा लगता है" ,मै अपनी आँखों को छुपा कर आंटी के पैर छूकर लिफ्ट की ओर बढ़ जाता हूँ...

59 टिप्‍पणियां:

  1. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

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  2. दिल तक जाती है बात

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  3. अनुराग जी, दिल कांप उठा आज का लेख पढ कर, मे अपने भगवान से यही प्रथाना करता हु, दुशमन को भी कोई दुख ना दे..
    मेरी बाजु का ओप्रेशन हुआ था तो डा० ने कहा था शायद ओप्रेशन के बाद काम ही ना करे, ओर भगवान की दया से सब ठीक रहा, जिन पर बीतती हे वो ज्यादा दर्द महसुस करते हे ऎसे लेखो का

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  4. अनुराग जी
    आपके लेख और आत्मकथ्य सदा ही रोचक और जानकारी वर्धक होते हैं। बधाई स्वीकारें।

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  5. जो तन बीते, वो तन जाने..
    बहुत दर्द महसूस हुआ आज.

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  6. भाई क्या कहूँ? कुछ नहीं है कहने को। ये बात वहाँ की है जहाँ शब्द भी गूँगे हो जाते हैं।

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  7. अनुराज जी फिर से भावुक करती यादें। मैं इन दर्द का अहसास कर सकता हूँ। क्योंकि मेरी बहन को ब्रेनटयूमर था। दो साल तक इन दर्द की गलियों में खूब घुमा हूँ। पर इस बात की खुशी है कि आज बहन स्वस्थ है। आपने सही लिखा।
    जिंदगी में हमारी सबसे बड़ी ग्लानि हमारे द्वारा किये ग़लत काम नही अपितु वे सही काम होते है जो हमने नही किये।

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  8. आपकी यादों से जुड़े कुछ संस्मरण इस तरह आपके लफ्जों में ढलते हैं की हम भी उन पलों के साथ ख़ुद को जुदा हुआ महसूस करते हैं .पढ़ कर कुछ कहने का लिखने का दिल नही हो रहा है ..जोड़ते रहे यूँ ही अपनी यादो के साथ हमें भी ..

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  9. अपने किसी को तकलीफ मे देखना जितना दुखद है उससे भी कही ज्यादा मुश्किल है इस बात का अहसास की आप उसके लिए कुछ नही कर सकते .....
    :
    जिन्दगी का सबसे बुरा पल ये महसूस करना होता है .... अक्सर लोग इस जज्बात को नहीं समझ पाते....i always hate this feeling...पर कोई न कोई मोड़ पर ऐसे आ जाती है की........

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  10. क्या कहें अनुरागजी, बेहद मर्मस्पर्शी संस्मरण... मन बोझिल हो गया।

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  11. ये आपने क्या सुना दिया दोस्त! दिन गमजदा हो गया। और अब आपसे क्या कहूं ..........वो ‘कृपा’ जिसको मैंने कभी देखा न मिला ......लगता है अब हमेशा के लिए मेरी जिंदगी में शामिल है आंख में आंसू की तरह....




    वो सवाल मेरे जहन में भी है ....AMPUTATION करवाया होता तो क्या कृपा बच जाती......??????

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  12. chak-de dekhkar hati to socha aapki sari purani post jo vaqt ki kami se nahi padh pati padh dalungi
    माँ बेटी के सिरहाने रहती ...बिना गीली पलक लिये,उस दौरान भी उन्हें किसी से कोई शिकायत नही रहती ,कभी भगवान् को नही कोसा ,कभी लोगो पर नही झुंझलाई ,कभी हालात ओर मुक्कद्दर जैसे शब्द सामने नही आये .. जिंदगी से रोज उसी शिद्दत से जूझना ओर पल पल के लिये लड़ना ,कहते है औरत अपने अधूरे सपने बेटी की आँखों में डाल देती है उन्हें उतने ही जतन ओर प्यार से सहेजती है ,पर टूटे सपनो को रोज सिलेवार लगाना उन्हें जोड़ने की जद्दोजहद मेरी जबान में उसे हिम्मत नही कहते ,हिम्मत से बड़ी ,उससे जुदा कोई चीज़ है .अपने किसी को तकलीफ मे देखना जितना दुखद है उससे भी कही ज्यादा मुश्किल है इस बात का अहसास की आप उसके लिए कुछ नही कर सकते
    log ise sasmaran kahe ya aapki apni dost ko yaad mai ise aapki ek maa ki kahani kahungi,meri ek dost jo shuru me aapki lambi post padhne me hichkichaati thi ,aaj usne mujhe phone kiya ki dekhna blog pe kya likha hai !aap rula dete hai ,sochti hun kitna kuch apne bhetar samete baithhe hai?

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  13. अनुराग जी , मेरे पास टिपन्नी के लिए उपयुक्त शब्द नही है ! मैं बहुत भावुक हो रहा हूँ ! आपने कभी नत मस्तक बोल कर मेरे ऊपर टिपन्नी की थी ! मैं आज आपको वोह वापस लौटा रहा हूँ ! आपके सामने मैं नत मस्तक हूँ ! इस समय तो कुछ भी टिपन्नी नही कर पाउँगा ! क्षमा चाहता हूँ ! आपने रुला ही दिया है !

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  14. "अपने किसी को तकलीफ मे देखना जितना दुखद है उससे भी कही ज्यादा मुश्किल है इस बात का अहसास की आप उसके लिए कुछ नही कर सकते"
    कितनी सच्ची बात लिखी है आपने...पापा एम.डी.एस.(रक्त केंसर) से देह त्यागे...डाक्टर ने कहा था छे महीने अधिक से अधिक बस...और वो छे महीने हमारे लिए जिंदगी भर की पीड़ा छोड़ गए जिसे व्यक्त करना आसान नहीं...पल पल अपने प्रिय को अपने से दूर जाते देखना कैसा होता है...शब्द नहीं बता सकते.
    पोस्ट पढ़ कर मन विषाद से भर गया...सोचता हूँ की अगर इश्वर है तो वो ऐसा क्यूँ है...???
    नीरज

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  15. .


    सहमत हूँ तुमसे...
    काग़ज़ के टुकड़े का कहर टूटते मैंने भी देखा है,
    पर इतना उम्दा अंदाज़-ए-बयाँ तुमने अपने नाम कर रखा है,
    आज पहली बार किसी से ईर्ष्या हो रही है..
    शानदार...यकीनन ही शानदार क़िताबत की मिसाल है, यह अफ़साना !

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  16. padhte padhte galaa rundh gaya....kya kahoon dr. saab? iski prashansa karna ise chotaa karna hoga. Magar hairan hoon...unki mataji ke hausle aur dridhata ko dekhkar. kitna kuch likhkar delete kar diya....shabd kuch chote se pad rahe hain.

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  17. इण्टरेस्टिंग। इसी माध्यम से अफसरशाही की दुनिया से अलग डाक्टरों की दुनियां झांक लेता हूं!

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  18. डाक्टर फ़िर से एक धक् कर देने वाली पोस्ट...... अन्तिम पंक्ति में पता नही क्यों एक चिहुंक सी होती है..... जिन्दगी के मायने हर पल क्षण बदल जाते हैं..... लगता है कि भवंर पार कर जाऊंगा बिना भीगे लेकिन.... उम्दा...

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  19. वाह क्या विषय चुना है, कमाल कर दींता!

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  20. डॉ.अनुराग जी,
    एक ही मार्मिक बात को कितनी पोस्ट में कहेंगे? क्या ये "उसे" अच्छा लगेगा? माना कि पोस्ट का कलेवर बदल गया है...
    लगता है कि टिप्पणीकारों से भी वो पोस्ट छूट गयी है या फ़िर उन्हें याद नहीं.

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  21. जिंदगी में हमारी सबसे बड़ी ग्लानि हमारे द्वारा किये ग़लत काम नही अपितु वे सही काम होते है जो हमने नही किये
    " these words itself refelects the essence of the post, are can say moral of the story and touched me lot"

    Regards

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  22. ऐसी पोस्ट पर क्या टिपण्णी करूँ? कुछ समझ नहीं आ रहा... बहुत सेंटी पोस्ट है !

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  23. डॉ अजीत जी

    २६ मार्च २००४ की ये बात है ,शाम ६ या ७ बजे की मेरी ओर जाट की बरोदा से हमारी flight थी,अंकल आंटी से भी मिलना था ,पहले दो दिन तो यार दोस्तों में ही बीत गये थे ,जिग्नेश के यहाँ रुके थे इसलिए दोहपहर का खाना उसके यहाँ बना था ,गुजराती खाना अलग होता है ओर आंटी ने मेहनत करके हमारे लिए पंजाबी खाना बनाया था ..अभिजीत ओर नीलिमा ने ठीक कहा है दरअसल ये पोस्ट माँ को समर्पित है बात बहुत साधारहण थी खाना खाने की ,पर उन्हें क्यों नही मन कर सका ये लिखना चाहता था ,उनके लिए मन में इतनी श्रद्धा क्यों है ?उनका व्यक्तित्व क्यों विशाल है ये बिना कृपा का जिक्र छेड़े समझाना मुश्किल था ,कुछ पुराने फोटो हाथ आये ,उन्हें स्केन किया इसलिए यहाँ कृपा का जिक्र किया ...वैसे भी इस माँ के यथार्थ की व्याख्या करना मुश्किल है.....इतने लोगो ने अब पढ़ा है ये भी एक कारण है

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  24. Anurag, kisi ke dard ko dekhna aur samajhna ek baat hai aur usey gahrai se mahsoos karna doosri baat.
    Aap mein doosron ke dard ko gahrai se samajhne ki khshmta hai.
    Post ke barey mein kuch nahi kahenge, kyonki sab kuch kah denge to bahar nikal jayega.

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  25. उस उम्र मे जब जिंदगी दुबारा अच्छी लगने लगे सपने रोज आपके बिस्तर के सिरहाने पड़े मिले ,एक कागज का टुकडा फ़िर आपको इत्तिला दे की आपके सपनो की मियाद इतनी ही थी ....सच जानिये बड़ी बड़ी बाते किताबो मे पढ़ना ,ओर दूसरो को दिलासा देना बेहद आसान है पर ख़ुद उन रास्तों पर गुजरना बेहद मुश्किल....

    in panktiyo.n ko padh kar shayad hi koi ho jis ki ankhe nam na ho jaye.n. bahut bada satya hai ye

    अपने किसी को तकलीफ मे देखना जितना दुखद है उससे भी कही ज्यादा मुश्किल है इस बात का अहसास की आप उसके लिए कुछ नही कर सकते

    cancer se suffer karne vale logo ke apno ka yahi kashta hai...they helpless.

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  26. किसी अपने को खो देने का दर्द वास्तव में असहनीय होता है!आपने बहुत अच्छा किया जो उनके साथ खाना खाया!

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  27. Anurag ji Kripa ke bare me pahle bhi padha tha aapke blog pe.... tab bhi dil bhar aay tha aur aaj padhne ke phir wahi hua.. abhi tak mai samjhta ki log aise hi kahte hai ki m a emotional person.. lekin ab jake pata chala yes I am a emotional person..

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  28. यादे तो सबके पास होती है मगर उन्हे शब्दो में ढालना ...............
    बेहतरीन प्रस्तुति है

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  29. अनुराग जी,अभी अभी आपकी पोस्ट पढ़ी, कितनी देर लगी ख़ुद को समेटने में,काफी देर कुछ भी कह पाने में नाकाम रही,ये दर्द जो कृपा के घर वालों ने बर्दाश्त किया है, वो हम चाहें भी तो महसूस नही कर सकते, लेकिन कभी कभी बहुत शिकायत सी होती है खुदा से, एक हँसते मुस्कुराते इंसान को से इतनी बेदर्दी से उसकी जिंदगी, उसके सपने छीन कर क्या मिलता है उसे....एक ऐसे ही हँसते मुस्कुराते लड़के का दर्दनाक अंजाम मैंने भी देखा है..आज तक उस दर्द को भुला नही पाई,कृपा की कहानी ने उसी की याद दिला दी....क्या कहूँ..बस यही की खुदा ये बेबसी किसी को न दे...जो चले जाते हैं..वो तो चले जाते हैं..लेकिन उनके पीछे कुछ नही कर पाने का दर्द लिए उनके अपने सारी जिंदगी खून के आंसू रोते रहते हैं..
    आप की बात करूँ तो आपके लिखने का अंदाज़ अपने पूरे शबाब पर रहा है...आप लिखते नही, पढने वालों पर सहर तारी कर देते हैं...thanks

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  30. Dr. anurag... meri naina aapke asal zindagi mein ek mitr thi!!laga meri kalpana ki ek patr.. sach mein main thodi der ke liye sehem gayi

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  31. आज फिर गले में कुछ अटक गया ... आँसू की बूँदे आँखों मे ही अटक गई... पहले सई और आज कृपा की यादो ने रुला दिया...

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  32. कहने लायक कुछ नहीं..बस मन दुखी हो गया।

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  33. भावुक करता अति मर्मस्पर्शी आलेख. एक एक वाकया दिल में लगता रहा सीधे.अद्भुत लेखन.

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  34. आपके आलेख को पध कर आंख नम हो गई और आपने मेरी एक मित्र नूपुर की याद को जेहन में ताज़ा कर दिया जो मात्र १९ वर्ष की उम्र में कैंसर को भेंट चढ गई थी. आप का लिखा एक एक लफ़्ज़ दिल को हिला देता है.

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  35. अति भावुक और मार्मिक लेख है !
    लगता है आप अति भावुक हैं डा. साब !
    आपकी भावुकता को प्रणाम

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  36. माफ़ी. माफ़ी. माफ़ी.
    बहुत से सेंटीमेंटल करदेने वाली पोस्ट है सरजी.
    और क्या कहूँ? समझ नहीं पा रहा हूँ.

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  37. anurragji..us shaant krupa ke andar..jo toofan utha hoga wo main jaanti hu..mehsoos kar sakti hu...us adeeg maa ka dil kitna roya hoga..ye bhi jaanti hu..mere parents bhi mere liye aise hi chattan bankar khade the...ek raat meri bhi guzri hai..jab kal ka sooraj dikhega ya nahi..kisi ko pata nahi tha...

    maine dekh liya..krupa nahi dekh paayi..

    rulaa diya aapne..
    likhte rahe...

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  38. anurragji..us shaant krupa ke andar..jo toofan utha hoga wo main jaanti hu..mehsoos kar sakti hu...us adeeg maa ka dil kitna roya hoga..ye bhi jaanti hu..mere parents bhi mere liye aise hi chattan bankar khade the...ek raat meri bhi guzri hai..jab kal ka sooraj dikhega ya nahi..kisi ko pata nahi tha...

    maine dekh liya..krupa nahi dekh paayi..

    rulaa diya aapne..
    likhte rahe...

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  39. sach hai ki jo kaam insaan nahi karata hai use sochakar hi use manasik glaani hoti hai . bahut sundar bhavuk kar dene wali post or iske age ab kuch nahi soojh raha hai .bhai kamal ka lekhan hai apka .abhaar.

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  40. अनुराग जी बहुत ही भावुक कर देने वाली पोस्ट है....मेरे पास टिपण्णी के लिए कोई शब्द ही नही हैं ...

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  41. आप सभी का शुक्रिया ....जीवन चलते रहने का नाम है....

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  42. कृपा की मां के हौसले को सलाम

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  43. हम दोस्त अब सब अपनी अपनी जिंदगी में मसरूफ है ,उनमे से दो बहार है एक अमेरिका में है ओर दूसरी u.k में ,जाट हरयाना में है .कृपा के छोटे भाई की शादी में हम ४ लोग तो मुंबई गए थे ,मई ,जाट ,जिग्नेश ओर अदिति u.k वाली दोस्त...आंटी की आँखे नम हो गई थी....बाकि सब कही न कही उलझे जरूर थे पर सबके मन साथ थे ...आप सभी का शुक्रिया......

    उत्तर देंहटाएं
  44. सर्वेश्वर ने लिखा है :

    "मैं जहाँ होता हूँ
    वहाँ से चल पड़ता हूँ
    अक्सर एक व्यथा
    यात्रा बन जाती है ।"

    आपकी यह पोस्ट पढकर यही महसूस हुआ .

    उत्तर देंहटाएं
  45. "टूटे सपनो को रोज सिलेवार लगाना उन्हें जोड़ने की जद्दोजहद मेरी जबान में उसे हिम्मत नही कहते ,हिम्मत से बड़ी ,उससे जुदा कोई चीज़ है "

    gulzar sahib ki ek triveni yaad aa gayi....

    "sab pe aati hai sabki baari se
    maut munsib hai kum-o-pesh nahi

    zindagi sab pe kyun nahi aati"

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  46. नत मस्तक हू!! मार्मिक लेख..

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  47. अनुराग जी, कल से आप के ब्लॉग से रूबरू हुआ हूँ। लेकिन इस उम्र में रोना तो अच्छा' नहीं है ना ? क्या आप के शब्द और अभिवयक्ति ही ऎसी है कि.……

    उत्तर देंहटाएं

कुछ टिप्पणिया कभी- कभी पोस्ट से भी सार्थक हो जाती है ,कुछ उन हिस्सों पे टोर्च फेंकती है ... .जो लिखने वाले के दायरे से शायद छूट गये .या जिन्हें ओर मुकम्मिल स्पेस की जरुरत थी......लिखना दरअसल किसी संवाद को शुरू करना है ..ओर प्रतिक्रिया उस संवाद की एक कड़ी ..

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